जप से पहले माला को सिद्ध और प्राण

जप से पहले माला को सिद्ध और प्राण प्रतिष्ठित करने की पूर्ण विधि🌷

मंत्र जप में माला केवल गिनती का साधन नहीं होती, अपितु यह साधक और देवता के बीच ऊर्जा का माध्यम बनती है। जब माला की विधिपूर्वक सिद्धि और प्राण प्रतिष्ठा की जाती है तब उसमें देव शक्ति का संचार होता है और उसी माला से किया गया जप अत्यंत प्रभावशाली हो जाता है। तंत्र और पुराणों में माला को सिद्ध करके ही जप आरंभ करने का निर्देश दिया गया है।
सबसे पहले प्रातःकाल या रात्रि में स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें और शांत स्थान में एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। उसी पर अपने इष्ट देवता की मूर्ति या चित्र स्थापित करें और उसके सामने माला को रखें।

अब माला की शुद्धि करें। माला पर पहले गंगाजल छिड़कें, फिर कच्चे दूध से हल्का स्पर्श कराएं और पुनः स्वच्छ जल से धोकर साफ कपड़े पर रख दें। इसके बाद चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करें तथा धूप और दीप प्रज्वलित करें।

इसके बाद दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें कि
“मैं (अपना नाम) अपने इष्ट देवता (देवता का नाम) के मंत्र जप के लिए इस माला की सिद्धि और प्राण प्रतिष्ठा कर रहा हूँ ताकि मेरे जप में शक्ति और सिद्धि प्राप्त हो।”

अब माला को दोनों हाथों में लेकर यह मंत्र 11 या 21 बार बोले

ॐ माले माले महामाले सर्वतत्त्व स्वरूपिणि।
चतुर्वर्ग स्थिता नित्यं तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥

इस मंत्र के जप से माला में देव शक्ति का आवाहन होता है।
इसके बाद उसी माला से अपने इष्ट देवता के मंत्र की कम से कम एक माला जप अवश्य करें। यही जप माला को सिद्ध करने की शुरुआत करता है। यदि संभव हो तो 5, 11 या 21 माला जप करना और भी श्रेष्ठ माना जाता है।

जप पूर्ण होने के बाद माला को अपने माथे से लगाकर प्रणाम करें और उसे गौमुखी या स्वच्छ कपड़े में सुरक्षित रखें। इसके बाद उस माला का उपयोग केवल उसी मंत्र के जप के लिए करें जिसके लिए उसे सिद्ध किया गया है।

शास्त्रों के अनुसार सिद्ध माला से किया गया जप सामान्य जप की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होता है और साधक को शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है।

बुलेशाह कहते हैं...चढ़दे सूरज ढलदे देखे

बुलेशाह कहते हैं...चढ़दे सूरज ढलदे देखे... बुझदे दीवे बलदे देखे. 
हीरे दा कोइ मुल ना जाणे.. खोटे सिक्के चलदे देखे. 
जिना दा न जग ते कोई, ओ वी पुतर पलदे देखे।. 
उसदी रहमत दे नाल बंदे  पाणी उत्ते चलदे देखे।. 
लोकी कैंदे दाल नइ गलदी,  मैं ते पथर गलदे देखे।. 
जिन्हा ने कदर ना कीती रब दी, हथ खाली ओ मलदे देखे ....
कई पैरां तो नंगे फिरदे, सिर ते लभदे छावा, 
मैनु दाता सब कुछ दित्ता, क्यों ना शुकर मनावा ..

शरणागति

शरणागति

 आर्तभाव से *हे मेरे दाता ! हे मेरे मालिक ! बचाओ ! बचाओ !! बचाओ !!!* ऐसे सत् करतार को पुकारना चाहिये; क्योंकि वे मेरे अपने स्वामी हैं, मेरे सर्व समर्थ सत् करतार हैं तो अब मैं चिन्ता क्यों करूँ ? और सत् करतार ने भी कह दिया है कि *तू चिन्ता मत कर* । इस वास्ते मैं निश्चिन्त हूँ - ऐसा कह कर मन से सत् करतार के चरणों में गिर जाओ और निश्चिन्त होकर सत् करतार से कह दो - *हे सिरजनहार ! यह सब आपके हाथ की बात है, आप जानो* ।